*****************
अनुत्तरित, अनुपूरित, विस्मित
नयनों की कोर से दिखती,
हाय री प्रेम की सुखशाला।
सुख-चैन छीन डाला,
विचलित, मचलित मन,
शांत न रह पाया,
हाय री प्रेम की सुखशाला।
सौम्य, सहज,संयत,
तन
मुखरित, पुलकित कर डाला,
हाय री, प्रेम की सुखशाला।
प्रेम-प्रतिज्ञा, प्रेम-प्रण।
प्रेम सहस्र ह्दय दर्पण,
प्रेम अवर्ण, प्रेम सुवर्ण,
प्रेम धैर्य का अविरल जल,
प्रेम की नदिया,
लचकत, मटकत
सब तहस-नहस कर डाला
हाय री प्रेम की सुखशाला।
प्रेम मुग्ध अधरों से निकली,
लटपट, अटपट वाणी है,
प्रेम नटखट नयनों से निकली
तीर विष वाली है।
प्रेम की गलियों में,
सरपट भागती
अनुगामिनी, प्रेम-रागिनी ने,
जग से मोह-भंग कर डाला,
हाय री, प्रेम की सुखशाला।
अटकत, धड़कत दिल,
मन -मीत संग,
अंकुरित, विकसित प्रेम कर डाला,
हाय री प्रेम की सुखशाला
सात फेरे, सात वचन,
साथ सात जनमों का यह,
निश्चय कर डाला,
हाय री, प्रेम की सुखशाला।
सरकत, भटकत अंग से आंचल,
धधकत प्रेम की ज्वाला,
विरह - विछोह का भय सतावै,
तड़पत मन - मतवाला ।
हाय री, प्रेम की सुखशाला।
प्रेम रग, प्रेम वैराग,
प्रेम सुलगती हुई आग।
प्रेम आलाप, प्रेम विलाप,
प्रेम दो अस्तित्व का है मिलाप।
सिमटी - लिपटी अधीर प्रणय को,
प्रीत रस रंग डाला,
हाय री प्रेम की सुखशाला l
प्रेम आकर्षण, प्रेम समर्पण
प्रेम इष्ट का साक्षात दर्शन,
प्रेम ने प्रेमी को भक्त बना डाला,
हाय री प्रेम की सुखशाला।
---- प्रियंका प्रियदर्शिनी
No comments:
Post a Comment