Wednesday, June 26, 2024

जिंदगी के रंग : मनीषी सिन्हा


ज़िंदगी के रंग
हर मोड़ पर ऐ जिंदगी लगती तुम अनजान हो 
पल पल रंग बदलती तुम करती बहुत हैरान हो ! 
 उम्मीदों की भोर हो और इत्मीनान की रात हो 
उल्लास भरे दिनों की कभी संतुष्ट सौगात हो ! 

 कर्मों की धधकती भट्ठी में इंसान का संघर्ष हो 
कहीं अभावों से घिरे जीवन का तुम विमर्श हो! 
 नियति की उलझनों में घिरी विवश दास्तान हो 
यथार्थ और आकांक्षाओं के बीच खींचतान हो ! 

 इंतजार की विकल घड़ियों का कभी आलाप हो 
 वियोग की दर्द भरी बारिश का तुम विलाप हो ! 
 कभी सफलता के शिखर का आनंद अतिरेक हो 
जीवन की रंगभूमि में हार के किस्से अनेक हो ! 

 जाने किन किन ख्वाहिशों के स्वप्न नित बुनती हो 
कोमल भावनाओं को तुम हौसले का पंख देती हो ! 
 सुख दुख के उतार-चढ़ाव में बसर होती रहती हो 
टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों पर अनवरत चलती रहती हो ! 

 - मनीषी सिन्हा 
गाजियाबाद उ० प्र० ( स्वरचित )

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