Thursday, June 27, 2024

कविता: बारिश : भगवानदास शर्मा "प्रशांत"

कविता: बारिश


नभके विस्तृत प्रांगण में जब, 
काले बादल घिर आते हैं। 
तरह तरह का भेष धरें, 
हम सबको बहुत लुभाते हैं।।

बादल के काले झुंड देख,
हम सब के मन हर्षाते हैं।
जब टकराते आपस में तो, 
बच्चों को बहुत डराते हैं।।

लगते मन के भोले भाले,
कभी झब्बर से बालों वाले, 
गज-झुंड में आते हो जैसे, 
कभी तोंद फुलायें मतबाले।।

रंगत धरती की बन जाती, 
रिमझिम फुहार बरसाते हैं। 
मिट्टी की खुशबू महाकाये, 
सब जीव जंतु सुख पाते है।। 

रिमझिम से होती शुरुआत, 
धरती की तृप्ति मिटाते है।
सब पोखर तालाब भर जाते 
फिर झींगुर मेंढक टर्राते है।।

बारिश के अद्भुत मौसम मेँ, 
सारी सृष्टि पुलकित होती है। 
चहुंओर हरित चादर सी बिछी,
वसुधा भी प्रफ्फुलित होती है।। 

धरती माता की प्यास बुझे, 
कृषकों के मन हर्षाते हैं। 
परिवार संग सब कृषक लोग, 
फिर खेतों मे जुट जाते है।। 

नदी नाल औ खेत खलियां, 
पानी मे सराबोर होते है। 
फिर धान रुपाई खेतों मे, 
चहुंओर हरियाली होती है।। 

बारिश मे चलती पुरवईया, 
सिहरन फुआर् मे भरती है। 
अंबर मे काळी घटा घिरे, 
मन को आल्हादित करती है।। 

सारी प्रकृति हो सराबोर, 
रिमझिम मे खूब नहाती है। 
पेड़ पौधे और जीव जंतु, 
नव सृजन में जुट जाते हैं।। 

कोंपल पर पड़ती जब बूँदें, 
डाली डाली मुस्काती है ।
मयूर,मराल,पपीहा,सारस,
खेतों मे नाचती गाती है।।

कितनी जरूरी होती बारिश, 
यह बात समझ में आती है। 
प्रकृति सृजन,धरती की तपिस्, 
तो सिर्फ बारिश से मिट पाती है।।

@भगवानदास शर्मा "प्रशांत" 
शिक्षक सह साहित्यकार 
इटावा उत्तर प्रदेश

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