घर -घर में भगवान बसे,
क्यों दर-दर ढूंढा करता।
हरिद्वार -काशी -प्रयाग,
क्यों मूरख भटका करता है।।१।।
मक्का और मदीना,काबा,
चैन नहीं दे पायेंगे।
जिसके माता-पिता दुखारी,
निष्फल सब हो जायेंगे।।२।।
चार धाम चौरासी कोश की,
परिक्रमा निष्फल होगी।
ईश से बढ़ मां-बाप तुम्हारे,
अगर नहीं पूजा होगी।।३।।
साक्षात् भगवान तुम्हारे,
फिर भी भटका करता है।
सारी दौलत पास तुम्हारे,
पाई-पाई को मरता है।।४।।
© रमापति मौर्य
No comments:
Post a Comment