Saturday, June 29, 2024

शिक्षा और संस्कार : वर्षा शिवांशिका

शिक्षा और संस्कार 


शिक्षा ज्ञान का भंडार ,
अज्ञान हरने का आधार। 
मानो जीवन का उपहार, 
निहित हो इन में संस्कार I

शिक्षा और संस्कार का अनुभव ,
सर्वप्रथम कहो ,मातृदेवो भव:, 
पितृदेवो भव:,आचार्य देवो भव:,
सीखो कहना अतिथि देवो भव: I

आदि ,विद्यारंभ,उपनयन, 
अनंत,वेदारंभ,समवर्तन, 
शिक्षा और संस्कार मिलन ,
यही जीवन का दिव्यदर्शन I

गर केवल हो शिक्षा ज्ञान ,
व्यर्थ उसका सभी संज्ञान ,
पशु सम संस्कारहीन जीवन,
समाज में केवल बाजारी करण I

क्या मंतव्य केवल धनार्जन ?
है क्या यह स्वच्छ वातावरण ?
यही से होता क्या भ्रष्ट आचरण ?
कैसे होगा कहो देश कल्याण ?

सबसे यही है प्रथम आगास ,
यही हो जन-जन का प्रयास,
शैक्षिक संस्कार का हो आवास ,
जिससे हो चहुंमुखी विकास।

© वर्षा शिवांशिका

Thursday, June 27, 2024

हम पंछी उन्मुक्त गगन के : शालिनी श्रीवास्तव सनशाइन

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
 हम पंछी उन्मुक्त गगन के , 
हौसलों से भरी हमारी उड़ान । 
 हमें ना कोई सरहद रोके, 
इस धरा से गगन तक होके। 

 नील गगन में उड़ते जाएं, 
सारी दुनिया घूम कर आएं। 
सतरंगी अंबर हमें बुलाए,
कुछ करने का जोश जगाए ।

आँखों में भर कर के सपने, 
पंखों पर रख कर विश्वास। 
निकल पड़े हम नए सफर पर, 
मंजिल है सारा आकाश। 

अठखेलियाँ करते हम नभ में,
बादल ,हवा, किरणों संग ,
रोक सके ना कोई बंधन, 
ना दुनिया के रीत रिवाज।

उम्मीदों के पंख पसारे,
जग अपना विस्तृत आकाश। 
हम पंछी उन्मुक्त गगन के,
छूना चाहें बस आकाश। 

स्वरचित अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित 
शालिनी श्रीवास्तव सनशाइन
 गोरखपुर उत्तर प्रदेश ।

मन भावन रात अंधियारी : अन्जू परिहार

मन भावन रात अंधियारी,
चन्दा चकोरी है बहुत दूरी है,
चन्द्रप्रभा मे आकाश जरूरी है।
चंचल किरणों की श्वेत आभा,
देखी है इसकी अथाह प्रभा...।।

मन भावन रात अंधियारी,
लट घूँघराले है बिखराती।
रात्रि अंधियारी है मुस्काती,
स्वप्न प्रभा मे हमें ले जाती...।।

नाविक अपनी नाव के सहारे,
सागर की लहरें हिलोरें मारे।
आकाश मे टिम - टिमाते तारे,
सारे जगमग हो गये सितारे...।।

चन्द्रमा की किरणें है पड़ती,
चंचल मन को है जकड़ती।
देख अथाह प्रेम की छाया,
चकोर चकोरी का मिलन है आया...।।

पेड़ों की झुरमुटों मे लिपटें,
एक - दूसरे के प्रेम मे झिपटे।
अति प्रेम की है ऐसी काया,
सारे जगत की यही है माया...।।

मोती रूपी बून्दे लिए..,
आकाश मे तारें है चमकते।
प्रेम की कल्पना लिए..,
बिछड़ने से प्रेमी है बिलखते...।।

-- अन्जू परिहार
शाहजहांनाबाद, भोपाल (मध्यप्रदेश)
दिनांक - 19/06/2024

कविता: बारिश : भगवानदास शर्मा "प्रशांत"

कविता: बारिश


नभके विस्तृत प्रांगण में जब, 
काले बादल घिर आते हैं। 
तरह तरह का भेष धरें, 
हम सबको बहुत लुभाते हैं।।

बादल के काले झुंड देख,
हम सब के मन हर्षाते हैं।
जब टकराते आपस में तो, 
बच्चों को बहुत डराते हैं।।

लगते मन के भोले भाले,
कभी झब्बर से बालों वाले, 
गज-झुंड में आते हो जैसे, 
कभी तोंद फुलायें मतबाले।।

रंगत धरती की बन जाती, 
रिमझिम फुहार बरसाते हैं। 
मिट्टी की खुशबू महाकाये, 
सब जीव जंतु सुख पाते है।। 

रिमझिम से होती शुरुआत, 
धरती की तृप्ति मिटाते है।
सब पोखर तालाब भर जाते 
फिर झींगुर मेंढक टर्राते है।।

बारिश के अद्भुत मौसम मेँ, 
सारी सृष्टि पुलकित होती है। 
चहुंओर हरित चादर सी बिछी,
वसुधा भी प्रफ्फुलित होती है।। 

धरती माता की प्यास बुझे, 
कृषकों के मन हर्षाते हैं। 
परिवार संग सब कृषक लोग, 
फिर खेतों मे जुट जाते है।। 

नदी नाल औ खेत खलियां, 
पानी मे सराबोर होते है। 
फिर धान रुपाई खेतों मे, 
चहुंओर हरियाली होती है।। 

बारिश मे चलती पुरवईया, 
सिहरन फुआर् मे भरती है। 
अंबर मे काळी घटा घिरे, 
मन को आल्हादित करती है।। 

सारी प्रकृति हो सराबोर, 
रिमझिम मे खूब नहाती है। 
पेड़ पौधे और जीव जंतु, 
नव सृजन में जुट जाते हैं।। 

कोंपल पर पड़ती जब बूँदें, 
डाली डाली मुस्काती है ।
मयूर,मराल,पपीहा,सारस,
खेतों मे नाचती गाती है।।

कितनी जरूरी होती बारिश, 
यह बात समझ में आती है। 
प्रकृति सृजन,धरती की तपिस्, 
तो सिर्फ बारिश से मिट पाती है।।

@भगवानदास शर्मा "प्रशांत" 
शिक्षक सह साहित्यकार 
इटावा उत्तर प्रदेश

Winners

आप सभी कलमकारो का हार्दिक स्वागत है अभिनंदन है  *श्रेष्ठ लेखनी कार्यक्रम जुलाई 2024* के कार्यक्रम में कुल ३३ प्रविष्टियां प्राप्त हुईं जिनमे...