शिक्षा ज्ञान का भंडार ,
अज्ञान हरने का आधार।
मानो जीवन का उपहार,
निहित हो इन में संस्कार I
शिक्षा और संस्कार का अनुभव ,
सर्वप्रथम कहो ,मातृदेवो भव:,
पितृदेवो भव:,आचार्य देवो भव:,
सीखो कहना अतिथि देवो भव: I
आदि ,विद्यारंभ,उपनयन,
अनंत,वेदारंभ,समवर्तन,
शिक्षा और संस्कार मिलन ,
यही जीवन का दिव्यदर्शन I
गर केवल हो शिक्षा ज्ञान ,
व्यर्थ उसका सभी संज्ञान ,
पशु सम संस्कारहीन जीवन,
समाज में केवल बाजारी करण I
क्या मंतव्य केवल धनार्जन ?
है क्या यह स्वच्छ वातावरण ?
यही से होता क्या भ्रष्ट आचरण ?
कैसे होगा कहो देश कल्याण ?
सबसे यही है प्रथम आगास ,
यही हो जन-जन का प्रयास,
शैक्षिक संस्कार का हो आवास ,
जिससे हो चहुंमुखी विकास।
© वर्षा शिवांशिका