हम पंछी उन्मुक्त गगन के ,
हौसलों से भरी हमारी उड़ान ।
हमें ना कोई सरहद रोके,
इस धरा से गगन तक होके।
नील गगन में उड़ते जाएं,
सारी दुनिया घूम कर आएं।
सतरंगी अंबर हमें बुलाए,
कुछ करने का जोश जगाए ।
आँखों में भर कर के सपने,
पंखों पर रख कर विश्वास।
निकल पड़े हम नए सफर पर,
मंजिल है सारा आकाश।
अठखेलियाँ करते हम नभ में,
बादल ,हवा, किरणों संग ,
रोक सके ना कोई बंधन,
ना दुनिया के रीत रिवाज।
उम्मीदों के पंख पसारे,
जग अपना विस्तृत आकाश।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के,
छूना चाहें बस आकाश।
स्वरचित अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित
शालिनी श्रीवास्तव सनशाइन
गोरखपुर उत्तर प्रदेश ।
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